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गीता का सार तत्व भक्ति योग

गीता का सार तत्व भक्ति योग

भगवान अर्जुन को धर्म का उपदेश दिया, कर्म का उपदेश दिया, ज्ञान का उपदेश दिया और जब सब उपदेश दे चुके तो अर्जुन ने कहा-- “महाराज ! मैं तो बड़े भारी संकट में पड़ गया हूं। क्योंकि आपने एक ओर तो मुझे संन्यास का उपदेश दिया, दूसरी ओर कर्मयोग का भी उपदेश दिया तथा कर्मयोग के साथ-साथ आपने यह शब्द भी जोड़ दिया कि क्या कर्म है, क्या अकर्म है, जिसका निर्णय करने में बड़े-बड़े विद्वान भ्रम में पड़ जाते हैं क्योंकि कर्म की गति बड़ी गहन है।

इसलिए महाराज ! मैं तो भ्रम में पड़ गया हूं कि क्या करूं और क्या करूं?” तब भगवान ने कहा--” अर्जुन! इस चक्कर से छूटने का एकमात्र यही उपाय है कि--


तुम समस्त धर्मों का परित्याग करके मेरी शरण में जाओ।” यद्यपि गीता में सबसे अधिक विस्तार ‘कर्मयोग’ का है, तथा उसमें ‘ज्ञानयोग’ भी विद्यमान है पर अंत में सारतत्व के रूप में भगवान उसमें ‘भक्तियोग’ की स्थापना करते हैं। इस प्रकार मानो गीता का तत्व यही भक्तियोग है।



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